महानदी जल विवाद पर दिल्ली में बड़ा संवाद, ओडिशा-छत्तीसगढ़ के बीच समाधान की नई राह तलाशने की कोशिश

अमित शाह की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक; वर्षों पुराने विवाद में अब राजनीतिक बातचीत के साथ तकनीकी प्रक्रिया पर भी जोर

ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे महानदी जल विवाद को सुलझाने की कोशिशों ने गुरुवार को एक नया चरण प्रवेश किया। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें जल बंटवारे और नदी के प्रबंधन से जुड़े मतभेदों को बातचीत के जरिए कम करने पर चर्चा हुई।

बैठक में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल, केंद्रीय जल आयोग के वरिष्ठ अधिकारी तथा दोनों राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महानदी विवाद लंबे समय से न्यायाधिकरण और कानूनी प्रक्रिया में रहा है। लेकिन 2026 में दोनों राज्यों के बीच तकनीकी और राजनीतिक बातचीत ने समाधान की दिशा में एक अलग रास्ता भी खोला है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

महानदी जल विवाद का मूल प्रश्न नदी के पानी के इस्तेमाल, नियंत्रण और दोनों राज्यों के बीच इसके बंटवारे से जुड़ा है।

ओडिशा लगातार यह चिंता जताता रहा है कि महानदी के ऊपरी हिस्से में जल परियोजनाओं और पानी के इस्तेमाल का असर राज्य में नदी के प्रवाह पर पड़ सकता है, खासकर गैर-मानसून अवधि में।

दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ का कहना है कि उसके क्षेत्र में सिंचाई, उद्योग और घरेलू जरूरतों के लिए महानदी के पानी का उपयोग आवश्यक है।

ओडिशा ने नवंबर 2016 में केंद्र सरकार से विवाद के समाधान के लिए न्यायाधिकरण गठित करने का अनुरोध किया था। बातचीत से समाधान नहीं निकलने के बाद केंद्र ने मार्च 2018 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया।

इसके बाद मामला वर्षों तक न्यायाधिकरण के समक्ष चलता रहा।

2026 में क्यों बदला बातचीत का तरीका?

इस साल दोनों राज्यों के रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिया। कानूनी लड़ाई के साथ-साथ बातचीत और तकनीकी अध्ययन के माध्यम से समाधान तलाशने पर जोर बढ़ा।

जुलाई में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की अध्यक्षता में दोनों मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई। केंद्र ने इसे बातचीत, तकनीकी सहयोग और सहकारी संघवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में कदम बताया।

इसके बाद तकनीकी स्तर पर भी काम आगे बढ़ा।

केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में दोनों राज्यों के अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच बातचीत हुई। कई तकनीकी मुद्दों पर सहमति बनने की जानकारी सामने आई और शेष विषयों पर चर्चा आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष की अध्यक्षता में विस्तारित तकनीकी समिति बनाई गई।

न्यायाधिकरण ने भी बातचीत का रास्ता खोला

जुलाई में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण ने केंद्र और केंद्रीय जल आयोग को दोनों राज्यों के बीच बातचीत में सहायता करने को कहा था।

न्यायाधिकरण ने संयुक्त तकनीकी व्यवस्था बनाने और बातचीत के माध्यम से मतभेद कम करने की दिशा में आगे बढ़ने को कहा।

सितंबर तक केंद्रीय जल आयोग की मध्यस्थता में हुई पिछली बैठकों की जानकारी न्यायाधिकरण के रिकॉर्ड में भी शामिल की गई। इसी दौरान दोनों राज्यों के बीच समझौते की संभावनाओं को देखते हुए न्यायाधिकरण की कार्यवाही में भी बदलाव आया।

इसलिए 1 अक्टूबर की बैठक अचानक हुई पहल नहीं है। इसके पीछे पिछले कई महीनों की राजनीतिक, कानूनी और तकनीकी प्रक्रिया है।

दोनों राज्यों के बीच बनी एक अहम सहमति

हालिया बातचीत में एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि दोनों राज्यों ने केंद्रीय जल आयोग की तकनीकी प्रक्रिया को महत्व देने की इच्छा जताई है।

जुलाई की बैठक के बाद उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों राज्यों ने केंद्रीय जल आयोग को लिखित रूप से यह आश्वासन दिया था कि दोनों के व्यापक हित में आयोग द्वारा लिया गया निर्णय स्वीकार्य होगा।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद के कई हिस्से तकनीकी प्रकृति के हैं—जैसे नदी में उपलब्ध पानी, ऊपरी क्षेत्र में उपयोग, नीचे की ओर पानी की आवश्यकता और विभिन्न मौसमों में प्रवाह।

इसलिए केवल राजनीतिक सहमति पर्याप्त नहीं होगी। किसी भी स्थायी व्यवस्था के लिए वैज्ञानिक आंकड़े और तकनीकी मूल्यांकन भी आवश्यक होंगे।

ओडिशा की मुख्य चिंता

ओडिशा के लिए सबसे बड़ा मुद्दा महानदी के पर्याप्त downstream flow से जुड़ा है।

राज्य का पक्ष रहा है कि गैर-मानसून अवधि में नदी के पानी की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। ओडिशा की कृषि और जल प्रबंधन व्यवस्था महानदी से जुड़ी हुई है।

इसी कारण नदी के प्रवाह और ऊपरी हिस्से में पानी के उपयोग को लेकर राज्य की चिंता लगातार बनी रही है।

महानदी विवाद का संबंध ओडिशा की महत्वपूर्ण जल संरचना हीराकुद व्यवस्था से भी जुड़ता है, इसलिए जल प्रवाह का प्रश्न राज्य के लिए व्यापक महत्व रखता है।

छत्तीसगढ़ की जरूरतें

छत्तीसगढ़ का पक्ष मुख्य रूप से अपने क्षेत्र में महानदी के पानी के उपयोग के अधिकार और जरूरतों से जुड़ा है।

राज्य सिंचाई, औद्योगिक गतिविधियों और घरेलू आवश्यकताओं के लिए पानी का उपयोग करना चाहता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हालिया बातचीत में वैज्ञानिक आंकड़ों, पारदर्शिता और संवाद के आधार पर दोनों राज्यों के लिए स्वीकार्य समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है।

20 सितंबर की बैठक ने बढ़ाई गति

दिल्ली बैठक से पहले 20 सितंबर को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भुवनेश्वर में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से मुलाकात की थी।

उस बैठक के बाद दोनों पक्षों की ओर से सहयोग और बातचीत के जरिए आगे बढ़ने की बात सामने आई। साय ने भी विवाद के समाधान को लेकर उम्मीद जताई थी।

इसके बाद 1 अक्टूबर की उच्चस्तरीय बैठक के लिए राजनीतिक आधार तैयार हुआ।

आज की बैठक का असली महत्व

दिल्ली की बैठक में महानदी विवाद के तीन अलग-अलग पहलुओं को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है—

पहला, दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बातचीत।

दूसरा, केंद्रीय जल आयोग के नेतृत्व में तकनीकी अध्ययन और परामर्श।

तीसरा, महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के सामने चल रही कानूनी प्रक्रिया।

केंद्र इन तीनों रास्तों को एक-दूसरे के साथ जोड़कर समाधान की संभावना तलाश रहा है।

अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

बातचीत का सबसे कठिन चरण अब शुरू हो सकता है। राजनीतिक स्तर पर सहमति की इच्छा व्यक्त करना एक बात है, लेकिन वास्तविक जल-बंटवारे का फार्मूला तैयार करना दूसरी।

किस मौसम में कितना पानी उपलब्ध होगा, ऊपरी हिस्से में कितना उपयोग होगा, ओडिशा की downstream आवश्यकता कितनी होगी, पानी की निगरानी कैसे होगी और भविष्य में कम बारिश या अधिक मांग की स्थिति में व्यवस्था कैसे चलेगी—इन सवालों का जवाब किसी भी स्थायी समझौते में जरूरी होगा।

अभी तक कोई अंतिम जल-बंटवारा समझौता घोषित नहीं हुआ है। न्यायाधिकरण भी कानूनी ढांचे का हिस्सा बना हुआ है और तकनीकी चर्चाएं जारी हैं।

महानदी विवाद अब केवल दो राज्यों के बीच राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं रह गया है। यह जल उपलब्धता, कृषि, उद्योग, घरेलू जरूरतों, तकनीकी आंकड़ों और संघीय सहयोग से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है।

1 अक्टूबर की दिल्ली बैठक ने विवाद को समाप्त नहीं किया है, लेकिन इसने बातचीत को एक नए राजनीतिक स्तर तक जरूर पहुंचाया है।

अब नजर इस बात पर होगी कि केंद्रीय जल आयोग के नेतृत्व में चल रही तकनीकी प्रक्रिया से क्या ठोस ढांचा सामने आता है और क्या ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ उस व्यवस्था को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

नाई भारत | भुवनेश्वर
1 अक्टूबर 2026