फ्लाई ऐश को कचरे से संसाधन में बदलने की दिशा में ओडिशा का नया कदम

नालको और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बीच समझौता; पर्यावरण आकलन, उपयोग और तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर जोर

भुवनेश्वर: औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाली फ्लाई ऐश के प्रबंधन को केवल निपटान के विषय तक सीमित रखने के बजाय उसके वैज्ञानिक उपयोग और संसाधन के रूप में इस्तेमाल की संभावनाओं पर ओडिशा में नया जोर दिखाई दे रहा है। इसी दिशा में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नालको रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी सेंटर के बीच फ्लाई ऐश प्रबंधन को लेकर एक समझौता हुआ है।

यह समझौता 18 सितंबर को भुवनेश्वर में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 43वें स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान हुआ। कार्यक्रम में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया मौजूद रहे। नालको की ओर से निदेशक (उत्पादन) पंकज कुमार शर्मा सहित संबंधित अधिकारी भी उपस्थित थे।

इस पहल का मुख्य महत्व इस बात में है कि फ्लाई ऐश को केवल औद्योगिक अवशेष मानकर उसके भंडारण या निपटान पर ध्यान देने के बजाय उसके उपयोग, पर्यावरणीय मूल्यांकन और तकनीकी प्रबंधन को एक साथ देखने की कोशिश की जा रही है।

ओडिशा जैसे औद्योगिक राज्य में यह विषय खास महत्व रखता है। खनन, बिजली, धातु और अन्य औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के साथ औद्योगिक उप-उत्पादों का वैज्ञानिक प्रबंधन पर्यावरणीय प्रशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

नालको अपनी पर्यावरणीय गतिविधियों से संबंधित आंकड़े और रिपोर्ट भी प्रकाशित करता है। कंपनी की वेबसाइट पर अगस्त 2026 का ऐश यूटिलाइजेशन स्टेटस भी उपलब्ध कराया गया है।

नए समझौते के तहत पर्यावरणीय आकलन, फ्लाई ऐश के लाभकारी उपयोग तथा प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उद्देश्य रखा गया है। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात से तय होगा कि इन उद्देश्यों को औद्योगिक स्तर पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।

फ्लाई ऐश का उपयोग निर्धारित मानकों के तहत सीमेंट, ईंट और निर्माण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है। नालको के पर्यावरण संबंधी दस्तावेज भी फ्लाई ऐश के उपयोग को बढ़ाने तथा संबंधित पर्यावरणीय रिपोर्टिंग की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हैं।

इस समझौते की एक महत्वपूर्ण कड़ी निगरानी व्यवस्था भी होगी। उसी कार्यक्रम के दौरान ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने औद्योगिक प्रदूषण की निगरानी के लिए ड्रोन आधारित प्रणाली शुरू की। बोर्ड ने पर्यावरणीय जानकारी और जनसंपर्क को मजबूत करने के लिए एआई आधारित चैटबॉट भी लॉन्च किया।

इससे संकेत मिलता है कि राज्य में पर्यावरण प्रबंधन को पारंपरिक निरीक्षण व्यवस्था से आगे बढ़ाकर तकनीक आधारित निगरानी से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

फ्लाई ऐश प्रबंधन में अगली बड़ी चुनौती परिणामों को मापने की होगी। कितना फ्लाई ऐश उत्पन्न हो रहा है, उसका कितना हिस्सा उपयोग में आ रहा है, किन क्षेत्रों में सुरक्षित उपयोग संभव है, परिवहन और भंडारण के दौरान पर्यावरणीय जोखिम कैसे कम होंगे और नियमों का पालन किस तरह लगातार सुनिश्चित किया जाएगा—इन सवालों का जवाब इस पहल की वास्तविक उपयोगिता तय करेगा।

नालको की औद्योगिक एवं तकनीकी क्षमता और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नियामकीय विशेषज्ञता यदि प्रभावी रूप से एक साथ काम करती है, तो यह सहयोग अनुसंधान, उद्योग और पर्यावरणीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय का आधार बन सकता है।

आखिरकार इस समझौते की सफलता किसी समारोह या दस्तावेज से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से मापी जाएगी—फ्लाई ऐश का जिम्मेदार उपयोग कितना बढ़ा, पर्यावरणीय निगरानी कितनी मजबूत हुई और औद्योगिक अवशेषों के दीर्घकालिक प्रबंधन का दबाव कितना कम हुआ।

नाई भारत | भुवनेश्वर