उपमुख्यमंत्री के.वी. सिंहदेव और कालिकेश सिंहदेव ने परिवार के साथ बलांगीर राजमहल में मनाया नुआखाई; पारंपरिक नवअन्न ग्रहण के बाद लोगों से की शुभकामनाओं की अदला-बदली, पारिवारिक शोक के चलते उदयपुर के लिए रवाना हुए के.वी. सिंहदेव
पश्चिमी ओडिशा का प्रमुख कृषि एवं सांस्कृतिक पर्व नुआखाई परंपरा, कृतज्ञता और सामाजिक जुड़ाव के वातावरण में मनाया गया। नई फसल के स्वागत का यह पर्व परंपरागत रूप से देवी-देवताओं को पहली उपज अर्पित करने, परिवार के साथ नवअन्न ग्रहण करने, बड़ों का आशीर्वाद लेने तथा रिश्तेदारों और समाज के लोगों के साथ शुभकामनाएं साझा करने से जुड़ा है।
बलांगीर के राजमहल में भी नुआखाई की यही सांस्कृतिक भावना दिखाई दी। उपमुख्यमंत्री के.वी. सिंहदेव और कालिकेश सिंहदेव ने परिवार के सदस्यों के साथ नुआखाई मनाया और पारंपरिक रीति-रिवाजों में भाग लिया।
राजमहल में नवअन्न की परंपरा
राजमहल में नुआखाई का आयोजन पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक बना। परिवार के सदस्यों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए नवअन्न ग्रहण किया।
नई फसल का पहला अन्न केवल भोजन का प्रतीक नहीं है। यह किसानों की मेहनत, धरती की उदारता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की भावना को दर्शाता है।
परिवार के साथ नवअन्न ग्रहण करने की परंपरा नुआखाई को भावनात्मक रूप से भी विशेष बनाती है। इसमें अलग-अलग पीढ़ियां एक साझा सांस्कृतिक परंपरा के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
बलांगीर राजमहल में सिंहदेव परिवार का यह आयोजन परंपरा, पारिवारिक एकता और उत्सव की इसी भावना को सामने लाया।
परिवार के साथ नुआखाई ने बढ़ाई उत्सव की गर्माहट
नुआखाई की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में परिवार का एक साथ आना शामिल है।
व्यस्त जीवन के बीच यह पर्व परिवार के सदस्यों को साथ बैठने, नई फसल साझा करने और आपसी संबंधों को मजबूत करने का अवसर देता है। राजमहल में सिंहदेव परिवार की मौजूदगी ने इसी पारंपरिक भावना को प्रदर्शित किया।
इस लिहाज से यह अवसर केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का भी माध्यम बना।
राजमहल से लोगों तक पहुंचा ‘नुआखाई जुहार’
पारंपरिक अनुष्ठान और नवअन्न ग्रहण के बाद सिंहदेव परिवार ने लोगों के साथ ‘नुआखाई जुहार’ के माध्यम से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी किया।
पश्चिमी ओडिशा के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में ‘नुआखाई जुहार’ का विशेष महत्व है। यह सम्मान, स्नेह, सद्भाव और सामुदायिक जुड़ाव की भावना को व्यक्त करता है।
राजमहल में लोगों के साथ शुभकामनाओं का यह आदान-प्रदान इस बात को दर्शाता है कि नुआखाई केवल परिवार तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि समाज को भी एक साथ जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा है।
नुआखाई भेटघाट कार्यक्रम भी था निर्धारित
दिन में जनता के साथ एक अलग नुआखाई भेटघाट कार्यक्रम भी निर्धारित था।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों से मिलना, नुआखाई की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करना और आम लोगों के साथ पर्व की खुशियां साझा करना था।
हालांकि, परिवार में अचानक हुए एक दुखद घटनाक्रम के कारण दिन की आगे की योजनाओं में बदलाव करना पड़ा।
पारिवारिक शोक के बाद उदयपुर के लिए रवाना हुए के.वी. सिंहदेव
के.वी. सिंहदेव के संदेश के अनुसार, उन्हें श्रीमती विजय राज कुमारी के निधन की सूचना मिली, जिन्हें उनके संदेश में मेवाड़ की राजमाता साहिबा और उनकी बेटी की सास के रूप में संबोधित किया गया है।
निधन की खबर मिलने के बाद उन्हें तत्काल उदयपुर के लिए रवाना होना पड़ा।
इस अप्रत्याशित पारिवारिक परिस्थिति के कारण वह जनता के साथ निर्धारित नुआखाई भेटघाट कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने इस स्थिति के लिए लोगों के प्रति अपना हार्दिक खेद भी व्यक्त किया।
उत्सव से शोक तक बदल गया दिन का भाव
इस तरह नुआखाई का यह दिन दो अलग-अलग भावनाओं का साक्षी बना।
बलांगीर राजमहल में सिंहदेव परिवार ने परिवार के साथ नवअन्न ग्रहण किया, पारंपरिक नुआखाई मनाई और लोगों के साथ शुभकामनाएं साझा कीं। लेकिन अचानक मिली पारिवारिक शोक की खबर ने के.वी. सिंहदेव को तत्काल उदयपुर की यात्रा के लिए मजबूर कर दिया।
नुआखाई के उत्सवी माहौल और परिवार में हुए निधन के दुख के बीच यह दिन भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन गया।
यह घटनाक्रम इस बात को भी रेखांकित करता है कि परिवार के रिश्ते केवल खुशी के अवसरों पर ही नहीं, बल्कि दुख की घड़ी में भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
परंपरा, परिवार और मानवीय रिश्तों का पर्व
नुआखाई मूल रूप से धरती और नई फसल से जुड़ा पर्व है, लेकिन इसकी गहरी पहचान परिवार और मानवीय रिश्तों से भी जुड़ी हुई है।
बलांगीर राजमहल में नवअन्न के साथ परिवार के उत्सव से लेकर लोगों के साथ ‘नुआखाई जुहार’ और फिर पारिवारिक शोक के कारण उदयपुर की तत्काल यात्रा तक की घटनाएं इस पर्व के मानवीय पक्ष को सामने लाती हैं।
यह संदेश देती हैं कि परंपराएं जहां खुशी के क्षणों में लोगों को जोड़ती हैं, वहीं दुख की घड़ी में परिवार और रिश्तों का महत्व और अधिक गहरा हो जाता है।
पश्चिमी ओडिशा के लिए नुआखाई केवल नई फसल के आगमन का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों के नवीनीकरण, परंपराओं के सम्मान और सामुदायिक एकता की मजबूत पहचान भी है।
नुआखाई जुहार।

