तीन दशक की अड़चन टूटी: किशाऊ समझौते से छह राज्यों के जल प्रबंधन को मिली नई दिशा

टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचे बांध की राह खुली; 1,562 मिलियन घन मीटर जल भंडारण, 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट बिजली की योजना

नई दिल्ली: उत्तर भारत में पानी को लेकर वर्षों से चली आ रही अंतरराज्यीय बातचीत अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंची है, जहां छह राज्यों ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने 15 सितंबर को नई दिल्ली में समझौते पर हस्ताक्षर किए। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल मौजूद रहे।

किशाऊ परियोजना की खासियत यह है कि इसका असर केवल बांध स्थल तक सीमित नहीं रहेगा। जल भंडारण, सिंचाई, बिजली उत्पादन और यमुना में पानी की उपलब्धता—इन सभी को एक ही अंतरराज्यीय परियोजना से जोड़ा गया है।

किशाऊ का रास्ता 1994 में शुरू हुआ था

किशाऊ परियोजना की कहानी 2026 में शुरू नहीं हुई।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 12 मई 1994 को यमुना बेसिन की प्रस्तावित जल भंडारण परियोजनाओं को लेकर ऐसी व्यवस्था बनी थी कि अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग समझौते किए जाएंगे।

इसके बाद लखवार और रेणुकाजी जैसी परियोजनाओं से जुड़े विवादों के समाधान ने किशाऊ के लिए भी बातचीत का रास्ता खोला। परियोजना पर औपचारिक सहमति 16 जून 2026 को बनी और अब छह राज्यों के हस्ताक्षर के बाद इसे आगे बढ़ाने का संस्थागत आधार तैयार हुआ है।

इसलिए 15 सितंबर का समझौता एक नई घोषणा से ज्यादा, लंबे समय से चल रही बातचीत के एक महत्वपूर्ण चरण के पूरा होने का संकेत है।

टोंस नदी पर बनेगा विशाल बांध

किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है। यह नदी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा के साथ बहती है।

परियोजना में 232.6 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध का प्रस्ताव है।

इसके जलाशय की क्षमता लगभग 1,562 मिलियन घन मीटर होगी।

परियोजना से लगभग 97,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

इसका मतलब है कि किशाऊ को केवल बिजली परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे जल भंडारण और कृषि जरूरतों से भी जोड़ा गया है।

90 प्रतिशत वित्तीय भार केंद्र के जिम्मे

किशाऊ को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है।

सरकारी विवरण के अनुसार, परियोजना के वित्तीय भार का लगभग 90 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी। बाकी 10 प्रतिशत हिस्सा भागीदार राज्यों द्वारा 1994 की व्यवस्था के अनुरूप साझा किया जाएगा।

वित्तीय हिस्सेदारी का यह ढांचा छह राज्यों के बीच परियोजना को लेकर बनी सहमति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यमुना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है किशाऊ?

परियोजना का एक बड़ा पहलू यमुना के जल प्रवाह से जुड़ा है।

केंद्र सरकार के अनुसार, किशाऊ समझौते के तहत लगभग 25 प्रतिशत पानी यमुना के लिए उपलब्ध होगा। सरकार ने इसे दिल्ली और यमुना दोनों के लिए महत्वपूर्ण बताया है तथा पर्यावरणीय संरक्षण से भी जोड़ा है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह को लेकर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि अतीत में पानी के बंटवारे के दौरान नदी के लिए पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह का प्रावधान नहीं किया गया था। यह सरकार का आकलन/बयान है, न कि इस रिपोर्ट का स्वतंत्र निष्कर्ष।

छह राज्यों की भूमिका, अलग-अलग जरूरतें

किशाऊ समझौते में शामिल छह राज्यों की जरूरतें समान नहीं हैं।

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड ऊपरी नदी क्षेत्र में स्थित हैं और परियोजना के जल एवं बिजली घटकों से जुड़े हैं।

उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लिए सिंचाई और यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है।

राजस्थान परियोजना से जुड़ी निर्धारित जल हिस्सेदारी से जुड़ा है।

वहीं दिल्ली के लिए परियोजना का प्रमुख पहलू जल उपलब्धता और यमुना से संबंधित है।

इसलिए किशाऊ की वास्तविक चुनौती केवल बांध बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग राज्यों के हिस्सों और जरूरतों को एक साझा व्यवस्था में लागू करना है।

हिमाचल के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था

समझौते तक पहुंचने की प्रक्रिया में हिमाचल प्रदेश की चिंताओं पर भी चर्चा हुई।

केंद्र के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की मांगों को केंद्र की योजनाओं के माध्यम से समायोजित करने और भविष्य में राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय भार में सहायता देने का आश्वासन दिया गया है।

इससे स्पष्ट है कि परियोजना की सहमति केवल पानी के बंटवारे पर नहीं, बल्कि राज्यों की वित्तीय और तकनीकी चिंताओं को समायोजित करने पर भी निर्भर रही।

किशाऊ को मिली राष्ट्रीय परियोजना की पहचान

केंद्र सरकार ने किशाऊ को National Project घोषित किया है।

इससे परियोजना की वित्तीय संरचना में केंद्र की बड़ी भूमिका तय हुई है। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न वैधानिक, तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

यानी हस्ताक्षर के साथ बातचीत का एक बड़ा चरण पूरा हुआ है, लेकिन निर्माण और क्रियान्वयन का चरण अभी बाकी है।

2018 से 2026 तक जल समझौतों का सिलसिला

केंद्र सरकार ने किशाऊ को पिछले कुछ वर्षों में अंतरराज्यीय जल मामलों पर बनी सहमतियों की श्रृंखला से जोड़ा है।

PIB के अनुसार, लखवार, शाहपुर कंडी, रेणुकाजी, केन-बेतवा, पारबती-कालिसिंध-चंबल और अन्य जल संबंधी परियोजनाओं/मामलों में भी अलग-अलग चरणों में सहमति या प्रगति हुई है। सरकार ने किशाऊ को 2018 के बाद ऐसा दसवां जल संबंधी मामला बताया है, जिसे समाधान की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।

यह विवरण केंद्र सरकार के अपने आकलन के रूप में देखा जाना चाहिए।

अब असली सवाल: परियोजना कब जमीन पर उतरेगी?

किशाऊ पर समझौता हो चुका है। लेकिन किसी भी बड़े बहुउद्देशीय बांध की तरह अब आगे का चरण अधिक जटिल होगा।

तकनीकी मंजूरियां, पर्यावरण और अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं, वित्तीय प्रबंधन, निर्माण, पुनर्वास से जुड़े मुद्दे और छह राज्यों के बीच लगातार समन्वय—ये सभी परियोजना की अगली दिशा तय करेंगे।

यानी समझौता राजनीतिक और प्रशासनिक सहमति का पड़ाव है; वास्तविक परिणाम परियोजना के क्रियान्वयन से सामने आएगा।

टोंस से शुरू होकर यमुना तक

किशाऊ की कहानी अब केवल उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर बनने वाले एक बांध की कहानी नहीं रह गई है।

इसके साथ 1,562 मिलियन घन मीटर जल भंडारण, 97,000 हेक्टेयर सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन जैसे लक्ष्य जुड़े हैं। साथ ही यमुना में अतिरिक्त जल उपलब्धता का पहलू भी है।

छह राज्यों के हस्ताक्षर के बाद अब वर्षों की बातचीत को वास्तविक परियोजना में बदलने की जिम्मेदारी अगले चरण पर है।

1994 में शुरू हुई सहमति की प्रक्रिया ने 2026 में एक नया पड़ाव पार किया है। अब किशाऊ के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कागज पर बनी छह-राज्यीय सहमति समय के साथ जमीन पर जल, बिजली और सिंचाई के वास्तविक लाभ में बदल पाएगी?

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