कारखानों से बाजार तक: विश्वकर्मा पूजा ने बदली पारादीप की रफ्तार

17 बड़े पूजा पंडाल, 700 से अधिक स्टॉल और 300 से ज्यादा कारीगर; औद्योगिक नगरी में आस्था के साथ कारोबार और सामुदायिक भागीदारी का भी विस्तार

पारादीप: देबास्मिता परिडा। : साल के अधिकांश दिनों में पारादीप की पहचान बंदरगाह, जहाजों, उद्योगों, मशीनों और भारी औद्योगिक गतिविधियों से होती है। लेकिन विश्वकर्मा पूजा के साथ शहर की तस्वीर बदलने लगी है। कारखानों और कार्यस्थलों तक सीमित रहने वाला यह पर्व अब सड़कों, बाजारों और मोहल्लों तक फैलता दिखाई दे रहा है।

इस बार पारादीप में 17 बड़े पूजा पंडाल और 700 से अधिक व्यावसायिक एवं खाद्य स्टॉल तैयार किए जा रहे हैं। इसके साथ ही कोलकाता से आए 300 से अधिक कारीगर पंडालों और प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।

इन तैयारियों का पैमाना बताता है कि पारादीप में विश्वकर्मा पूजा अब केवल मशीनों और औजारों की पूजा तक सीमित नहीं रही। यह शहर की सामाजिक, सांस्कृतिक और अस्थायी व्यापारिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बनती जा रही है।

जब औद्योगिक शहर के कामगार बनते हैं उत्सव की ताकत

पारादीप की अर्थव्यवस्था में मशीनों, इंजीनियरिंग, परिवहन, वर्कशॉप और औद्योगिक प्रतिष्ठानों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इसी कारण विश्वकर्मा पूजा का यहां अलग महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प और तकनीकी कौशल से जोड़ा जाता है और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इस दिन मशीनों, औजारों तथा कार्यस्थलों पर विशेष पूजा की परंपरा रही है।

लेकिन पारादीप में अब इस औद्योगिक परंपरा का दायरा कार्यस्थलों से बाहर निकलकर पूरे शहर तक पहुंच रहा है।

कोलकाता के 300 से अधिक कारीगर बना रहे उत्सव की पहचान

पंडालों को आकार देने के लिए कोलकाता से 300 से अधिक कारीगर पारादीप पहुंचे हैं।

अलग-अलग टीमों में काम कर रहे ये कारीगर थीम आधारित पंडाल, सजावटी संरचनाएं और भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमाओं को तैयार कर रहे हैं।

उनके लिए यह केवल सजावट का काम नहीं है। कई दिनों से चल रहा निर्माण कार्य स्थानीय उत्सव को एक अलग दृश्य पहचान दे रहा है।

17 पंडालों के साथ तैयार हो रहा अस्थायी बाजार

विश्वकर्मा पूजा के दौरान पारादीप में एक समानांतर अस्थायी बाजार भी आकार ले रहा है।

700 से अधिक खाद्य और व्यावसायिक स्टॉल पूजा स्थलों और आसपास के इलाकों में लगाए जा रहे हैं।

खाने-पीने के कारोबार से लेकर छोटे व्यापारियों तक, बड़ी संख्या में लोग इस अस्थायी बाजार का हिस्सा बन रहे हैं।

इससे त्योहार धार्मिक आयोजन के साथ-साथ स्थानीय व्यापारियों और छोटे कारोबारियों के लिए भी गतिविधि का एक महत्वपूर्ण अवसर बन रहा है।

पारादीप में विश्वकर्मा पूजा का अलग अर्थ

किसी औद्योगिक शहर में विश्वकर्मा पूजा का संबंध केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि काम और कौशल से भी जुड़ा होता है।

मशीन चलाने वाले कर्मचारी, तकनीशियन, इंजीनियर, मैकेनिक, चालक और औद्योगिक श्रमिक — सभी इस परंपरा से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं।

पारादीप में यही औद्योगिक पहचान अब सार्वजनिक उत्सव का हिस्सा बन गई है।

यहां उद्योग त्योहार से अलग नहीं है; उद्योग ही त्योहार की पहचान का एक प्रमुख आधार बन रहा है।

मजदूरों से लेकर व्यापारियों तक, एक साझा मंच

त्योहार की तैयारियों में औद्योगिक प्रतिष्ठानों, ट्रेड यूनियनों, श्रमिकों, स्थानीय आयोजकों और विभिन्न समुदायों की भागीदारी दिखाई दे रही है।

विश्वकर्मा पूजा लोगों को कार्यस्थल की नियमित दिनचर्या से बाहर निकलकर परिवार और समुदाय के साथ समय बिताने का अवसर भी देती है।

पारादीप में इस दौरान हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदायों सहित अलग-अलग सामाजिक समूहों के लोग व्यापक उत्सवी माहौल का हिस्सा बनते हैं।

एक सप्ताह के लिए बदल जाती है शहर की पहचान

पारादीप को आमतौर पर एक औद्योगिक और बंदरगाह शहर के रूप में देखा जाता है। लेकिन विश्वकर्मा पूजा के दौरान शहर की सार्वजनिक जगहों पर एक अलग तस्वीर दिखाई देती है।

पंडाल, रोशनी, बाजार, भोजन, कारीगर और लोगों की आवाजाही मिलकर शहर की रफ्तार बदल देते हैं।

कुछ दिनों के लिए पारादीप की पहचान केवल बंदरगाह और उद्योगों से नहीं, बल्कि अपने लोगों और उनकी सामूहिक भागीदारी से होती है।

मशीनों के शहर में इस बार इंसान केंद्र में

17 बड़े पंडाल, 700 से अधिक स्टॉल और 300 से ज्यादा बाहरी कारीगर इस उत्सव के आकार को दिखाते हैं। लेकिन इसके पीछे की कहानी आंकड़ों से बड़ी है।

यह उन श्रमिकों की कहानी है जो शहर की औद्योगिक व्यवस्था को चलाते हैं। यह उन कारीगरों की कहानी है जो उत्सव को आकार देते हैं। यह उन व्यापारियों और खाद्य विक्रेताओं की कहानी है जिनके लिए त्योहार अस्थायी बाजार बन जाता है।

और यह उन स्थानीय समुदायों की कहानी है जो मिलकर शहर की सांस्कृतिक तस्वीर तैयार करते हैं।

विश्वकर्मा पूजा के दौरान पारादीप में मशीनें कुछ समय के लिए पीछे दिखाई देती हैं और उन्हें चलाने वाले हाथ शहर की पहचान के केंद्र में आ जाते हैं।

यही इस औद्योगिक बंदरगाह शहर की विश्वकर्मा पूजा का सबसे अलग चेहरा है।

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