नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजद का प्रदर्शन, मनमोहन सामल ने विपक्ष से मांगे ठोस सुझाव
भुवनेश्वर: ओडिशा की खनिज संपदा पर अधिकार और उससे मिलने वाले संभावित राजस्व को लेकर राजनीतिक टकराव अब सड़क से विधानसभा तक पहुंच चुका है। सोमवार को नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल ने भुवनेश्वर में एमएमडीआर संशोधन के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया, वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाते हुए आंदोलन के बजाय ठोस सुझाव देने की मांग की।
लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बनकर सामने आया है—संशोधित कानून का ओडिशा के राजस्व पर वास्तविक वित्तीय प्रभाव कितना होगा?
इसका अंतिम सरकारी आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है।
सरकार के पास अभी अंतिम आंकड़ा नहीं
ओडिशा विधानसभा में 25 सितंबर को इस्पात एवं खान मंत्री बिभूति भूषण जेना ने स्पष्ट किया कि सरकार ने संशोधित एमएमडीआर कानून की धारा 9डी के वित्तीय प्रभाव का अभी तक मात्रात्मक आकलन नहीं किया है।
मंत्री के जवाब के अनुसार, सरकार ने यह भी अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किया है कि पुराने खनिज कर बकाये में कितनी राशि वसूल की जा सकेगी, कितनी राशि वसूल नहीं हो पाएगी और धारा 9डी के कारण सालाना राजस्व पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
यही जवाब अब राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा आधार बन गया है।
विपक्ष का हमला: पहले स्पष्ट करो, असर कितना?
बीजद का तर्क है कि जब खनिज संसाधन ओडिशा की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं, तब राज्य के संभावित राजस्व प्रभाव को लेकर सरकार के पास स्पष्ट आंकड़ा होना चाहिए।
नवीन पटनायक ने सोमवार के प्रदर्शन में संशोधित कानून को ओडिशा के हितों और राज्य के अधिकारों से जोड़ते हुए व्यापक राजनीतिक आंदोलन का आह्वान किया। बीजद का कहना है कि कानून का दीर्घकालिक प्रभाव राज्य की वित्तीय क्षमता पर पड़ सकता है। ये बीजद के राजनीतिक दावे हैं; भाजपा इन आरोपों को स्वीकार नहीं करती।
भाजपा का जवाब: नुकसान का दावा किस आधार पर?
भाजपा ने विपक्ष के संभावित राजस्व नुकसान संबंधी दावों को चुनौती दी है।
भाजपा सांसद संबित पात्रा ने बीजद के बड़े राजस्व नुकसान के दावे को खारिज करते हुए अलग अनुमान पेश किया है। वहीं मनमोहन सामल ने बीजद के आंदोलन को राजनीतिक रणनीति बताते हुए कहा कि विपक्ष को विरोध के साथ-साथ व्यावहारिक विकल्प भी सामने रखने चाहिए।
इस तरह विवाद अब केवल यह नहीं है कि कानून सही है या गलत—बल्कि यह भी है कि ओडिशा को वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना हो सकता है और उस नुकसान की गणना किस आधार पर की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदला संदर्भ
इस विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का 2024 का महत्वपूर्ण फैसला भी है। Mineral Area Development Authority vs Steel Authority of India मामले में अदालत ने राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता को बरकरार रखा था। इसके बाद एमएमडीआर संशोधन ने राज्य के कराधिकार को लेकर नई राजनीतिक और कानूनी बहस पैदा की है।
यही कारण है कि ओडिशा में बहस केवल एक नए केंद्रीय कानून के प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में राज्य की कर क्षमता, पुराने बकाये की वसूली और भविष्य के खनिज राजस्व जैसे प्रश्न भी शामिल हैं।
नवीन बनाम सामल: दो अलग राजनीतिक रास्ते
नवीन पटनायक इस मुद्दे को ओडिशा के संसाधनों और राज्य के वित्तीय अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, मनमोहन सामल का जोर विपक्ष से ठोस सुझाव और समाधान सामने रखने पर है।
यानी एक तरफ सड़क पर आंदोलन और राज्य के अधिकारों की मांग है, तो दूसरी तरफ सरकार समर्थक पक्ष का सवाल है कि विपक्ष केवल विरोध के बजाय वैकल्पिक रास्ता क्या सुझा रहा है।
नाई भारत | 28 सितंबर 2026
असली परीक्षा अब आंकड़ों की
एमएमडीआर विवाद में राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है, लेकिन सबसे निर्णायक बहस आंकड़ों पर होगी।
कितना राजस्व प्रभावित होगा? पुराने बकाये का क्या होगा? राज्य की कराधान क्षमता पर वास्तविक असर कितना पड़ेगा? और संशोधित कानून लागू होने के बाद ओडिशा के पास कौन से वैधानिक विकल्प बचेंगे?
एमएमडीआर पर ओडिशा में बड़ा सवाल: असर का हिसाब नहीं, सियासी संघर्ष तेज
इन सवालों पर अंतिम सरकारी वित्तीय आकलन अभी उपलब्ध नहीं है।
इसीलिए एमएमडीआर विवाद आने वाले दिनों में केवल राजनीतिक प्रदर्शन का मुद्दा नहीं रहेगा। विधानसभा में सरकार को जहां वित्तीय प्रभाव और राज्य के हितों पर अधिक स्पष्टता देनी होगी, वहीं विपक्ष के सामने भी अपने दावों के समर्थन में ठोस आंकड़े और वैकल्पिक उपाय रखने की चुनौती होगी।
ओडिशा की खनिज संपदा पर जारी इस लड़ाई में अब सबसे बड़ा सवाल नारे नहीं, आंकड़े हैं।

