एमएमडीआर पर सुजाता का सीधा हमला: ओडिशा के खनिज अधिकारों की लड़ाई अब सड़क पर

लोअर पीएमजी में बीजद का बड़ा प्रदर्शन; पूर्व आईएएस अधिकारी ने खनिज राजस्व, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और ओडिशा के भाजपा सांसदों की भूमिका पर उठाए सवाल

भुवनेश्वर: ओडिशा में एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई सोमवार को विधानसभा से निकलकर भुवनेश्वर की सड़कों तक पहुंच गई। लोअर पीएमजी में बीजू जनता दल के बड़े प्रदर्शन में पार्टी नेता और पूर्व आईएएस अधिकारी सुजाता राउत कार्तिकेयन ने केंद्र की खनन नीति और राज्य के संभावित राजस्व हितों को लेकर भाजपा पर सवाल उठाए।

28 सितंबर का प्रदर्शन बीजद के घोषित राज्यव्यापी आंदोलन की शुरुआत के तौर पर सामने आया। पार्टी अध्यक्ष नवीन पटनायक ने भी सभा को संबोधित किया और संशोधित कानून के खिलाफ राज्य के हितों की रक्षा का मुद्दा उठाया।

सुजाता ने उठाया खनिज राजस्व का सवाल

सभा में सुजाता ने एमएमडीआर संशोधन को केवल खनन प्रशासन से जुड़ा कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि ओडिशा के संभावित वित्तीय हितों से जुड़ा विषय बताया।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि खनिज-युक्त भूमि और खनिज अधिकारों से संबंधित राज्य के कराधिकार सीमित होते हैं, तो इसका असर भविष्य में ओडिशा के राजस्व संसाधनों पर किस तरह पड़ सकता है।

उन्होंने सिंचाई, शिक्षा, किसानों के कल्याण, बुनियादी ढांचे और युवाओं के लिए रोजगार जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि खनिज क्षेत्र से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग राज्य के विकास में किया जा सकता है।

ओडिशा के भाजपा सांसदों पर भी सवाल

सुजाता ने संसद में ओडिशा से निर्वाचित भाजपा सांसदों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र द्वारा एमएमडीआर संशोधन विधेयक लाए जाने के दौरान राज्य के खनिज हितों को पर्याप्त मजबूती से नहीं उठाया गया।

यह बीजद का राजनीतिक आरोप है। भाजपा इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखती है और संशोधन को खनन क्षेत्र में पारदर्शिता, निवेश और औद्योगिक विकास से जोड़कर देखती है।

2024 का सुप्रीम कोर्ट फैसला बना राजनीतिक बहस का आधार

एमएमडीआर विवाद का एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ 25 जुलाई 2024 का सुप्रीम कोर्ट का नौ-न्यायाधीशीय संविधान पीठ का फैसला है। अदालत के बहुमत ने राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता को स्वीकार किया था।

ओडिशा में इस फैसले का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में खनिज-युक्त भूमि से जुड़े कर और बकाया राशि को लेकर पहले से कानूनी विवाद चला आ रहा था।

बीजद का तर्क है कि 2024 के फैसले से राज्यों की स्थिति मजबूत हुई थी और 2026 का एमएमडीआर संशोधन उस अधिकार के इस्तेमाल को प्रभावित कर सकता है।

धारा 9डी बनी विवाद का केंद्र

2026 के संशोधन में जोड़ी गई धारा 9डी राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य लेवी लगाने की शक्ति पर शर्तें और प्रतिबंध लागू करती है। संशोधित व्यवस्था में केंद्र को इन करों और लेवी से संबंधित शर्तें निर्धारित करने की शक्ति भी दी गई है।

यही प्रावधान अब ओडिशा की राजनीतिक बहस के केंद्र में है।

सरकार ने अभी नहीं बताया कितना फायदा या नुकसान होगा

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ओडिशा सरकार ने विधानसभा में अभी तक एमएमडीआर संशोधन से होने वाले संभावित वित्तीय लाभ या नुकसान का कोई अंतिम मात्रात्मक आकलन नहीं किया है।

25 सितंबर को राज्य के स्टील एवं माइंस मंत्री बिभूति भूषण जेना ने विधानसभा में कहा कि धारा 9डी के वित्तीय प्रभाव का अभी तक विभागीय स्तर पर अंतिम आकलन नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि संशोधित कानून के संचालन से जुड़े नियम, शर्तें और प्रतिबंध स्पष्ट होने के बाद इसके प्रभाव का मूल्यांकन किया जाएगा।

इसलिए फिलहाल राजनीतिक दावों में बताए जा रहे संभावित राजस्व नुकसान को अंतिम सरकारी आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।

बीजद के दावे बनाम भाजपा का पक्ष

बीजद का कहना है कि संशोधन से ओडिशा के खनिज संसाधनों से जुड़े संभावित राजस्व अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और राज्य को अपने वित्तीय हितों की रक्षा के लिए मजबूती से आवाज उठानी चाहिए।

दूसरी ओर, भाजपा ने बीजद के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। भाजपा की ओर से संशोधन को निवेश, पारदर्शी खनन व्यवस्था और औद्योगिक विकास के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।

इस तरह विवाद के दो अलग-अलग पहलू सामने हैं—एक ओर राज्यों के कराधिकार और संभावित राजस्व का प्रश्न, जबकि दूसरी ओर केंद्र के स्तर पर खनन व्यवस्था और औद्योगिक विकास का तर्क।

विधानसभा से आंदोलन तक

एमएमडीआर मुद्दे पर विधानसभा का माहौल भी पिछले सप्ताह से लगातार गर्म रहा है। विपक्षी दलों ने धारा 9डी और राज्य के संभावित वित्तीय प्रभाव को लेकर सरकार से जवाब मांगा है।

अब लोअर पीएमजी का प्रदर्शन इस बहस को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की बीजद की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

सुजाता राउत कार्तिकेयन के भाषण ने इस बहस में एक और आयाम जोड़ा—उन्होंने खनिज संसाधनों के सवाल को केवल वर्तमान राजस्व से नहीं, बल्कि ओडिशा के दीर्घकालिक विकास और आने वाली पीढ़ियों के आर्थिक हितों से जोड़कर रखा।

अगली लड़ाई आंकड़ों और कानून की व्याख्या पर

एमएमडीआर विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण अब तीन सवालों के इर्द-गिर्द घूम सकता है—संशोधित कानून का वास्तविक वित्तीय प्रभाव कितना होगा, धारा 9डी राज्य के मौजूदा कराधिकार और बकाया दावों को किस सीमा तक प्रभावित करेगी, और केंद्र द्वारा बनाए जाने वाले नियम इस व्यवस्था को किस रूप में लागू करेंगे।

जब तक इन पहलुओं पर आधिकारिक आकलन और लागू नियम सामने नहीं आते, तब तक ओडिशा को होने वाले संभावित नुकसान या लाभ के आंकड़ों को राजनीतिक दावों और प्रमाणित सरकारी आंकड़ों के बीच अलग-अलग देखना होगा।

लोअर पीएमजी का प्रदर्शन हालांकि यह साफ कर गया कि एमएमडीआर अब केवल विधानसभा की बहस का विषय नहीं रहा। ओडिशा में यह मुद्दा राज्य के खनिज संसाधनों, राजस्व और केंद्र-राज्य संबंधों पर एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है।

नाई भारत | 28 सितंबर 2026