सामाजिक असमानता, उत्पीड़न और समकालीन चुनौतियों को कविता के माध्यम से सामने लाने का प्रयास
भुवनेश्वर: राजधानी भुवनेश्वर के जयदेव भवन में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में नई काव्य कृति ‘उठिबा कि जातिर कंकाल’ का औपचारिक लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक लोगों की उपस्थिति रही। पुस्तक का लोकार्पण ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति ने किया।
यह साहित्यिक आयोजन विश्वमुक्ति से जुड़े कार्यक्रम के तहत आयोजित किया गया, जिसमें राज्य के साहित्यिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व शामिल हुए।
राज्यपाल ने किया पुस्तक का विमोचन
समारोह में राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति ने पुस्तक का विमोचन किया। इस अवसर पर उच्च शिक्षा, खेल एवं युवा मामले तथा ओड़िया भाषा, साहित्य एवं संस्कृति मंत्री सूर्यवंशी सूरज, कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन और एकाम्र के विधायक बाबू सिंह मौजूद रहे।
कार्यक्रम में साहित्य और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े प्रोफेसर विश्वरंजन, प्रसिद्ध लेखिका एवं वक्ता प्रोफेसर अर्चना नायक तथा विश्वमुक्ति पत्रिका के संस्थापक-संपादक प्रोफेसर शशांक चूड़ामणि भी उपस्थित रहे। लेखक के परिवार के सदस्यों, मित्रों और शुभचिंतकों ने भी समारोह में भाग लिया।
सामाजिक सरोकारों से जुड़ी काव्य कृति
लेखक के अनुसार, ‘उठिबा कि जातिर कंकाल’ का आधार समाज में दिखाई देने वाली विभिन्न परिस्थितियों और घटनाओं से उपजी आंतरिक प्रतिक्रियाएं हैं।
कृति में अन्याय, उत्पीड़न, दुर्घटनाओं और सामाजिक बाधाओं जैसे विषयों को रचनात्मक दृष्टि से सामने लाने का प्रयास किया गया है। लेखक ने बताया कि आसपास घटने वाली घटनाओं और उनसे उत्पन्न संवेदनाओं ने कविताओं के सृजन को प्रभावित किया।
कविताओं में व्यक्तिगत अनुभूति के साथ-साथ व्यापक सामाजिक परिस्थितियों को समझने और उन पर विचार करने का प्रयास दिखाई देता है।
कविता के जरिए समाज को देखने की कोशिश
यह काव्य संग्रह समकालीन जीवन से जुड़े अनुभवों को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने का प्रयास करता है। समाज में मौजूद पीड़ा, असमानता, संघर्ष और विभिन्न प्रकार की चुनौतियों को कविताओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।
कृति का शीर्षक भी अपने भीतर एक सवाल समेटे हुए है। यह सवाल पाठकों को समाज की वर्तमान स्थिति और उसके सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार करने की दिशा में ले जाता है।
युवा पाठकों तक पहुंचने की उम्मीद
लेखक को उम्मीद है कि यह काव्य संग्रह विशेष रूप से युवा पाठकों के बीच साहित्य और सामाजिक विषयों के प्रति रुचि पैदा करेगा।
समकालीन परिस्थितियों को कविता के माध्यम से समझने का प्रयास नई पीढ़ी के पाठकों के लिए अलग तरह का साहित्यिक अनुभव प्रस्तुत कर सकता है। इसी उद्देश्य से कृति को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने की अपेक्षा व्यक्त की गई है।
साहित्य और सामाजिक चिंतन का संगम

जयदेव भवन में आयोजित लोकार्पण समारोह केवल पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रहा। कार्यक्रम में साहित्य और समाज के बीच संबंधों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ।
साहित्यकारों, शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों तथा लेखक के परिचितों की मौजूदगी ने समारोह को व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप दिया। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने नई साहित्यिक कृति के प्रकाशन को ओड़िया साहित्य की समकालीन यात्रा में एक नई रचना के रूप में देखा।
अनुभवों से कविता तक का सफर
लेखक के अनुसार, इस पुस्तक की कविताएं समाज से अलग किसी कल्पित दुनिया में नहीं, बल्कि आसपास घट रही वास्तविक घटनाओं और परिस्थितियों से प्रेरित होकर आकार लेती गईं।
अन्याय, उत्पीड़न, दुर्घटनाओं और जीवन की विभिन्न कठिन परिस्थितियों से उत्पन्न संवेदनाओं को शब्द देने की प्रक्रिया ने इस संग्रह को आकार दिया। इस दृष्टि से पुस्तक व्यक्तिगत अनुभूति और सामाजिक अवलोकन के बीच एक साहित्यिक सेतु बनाने का प्रयास करती है।
समकालीन ओड़िया कविता में एक और कृति
‘उठिबा कि जातिर कंकाल’ समकालीन ओड़िया कविता के क्षेत्र में सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखकर प्रस्तुत की गई नई कृतियों में शामिल हुई है।
लेखक की अपेक्षा है कि यह संग्रह पाठकों, विशेषकर युवाओं के बीच संवाद पैदा करेगा और उन्हें कविता के माध्यम से समाज को देखने तथा समझने का अवसर देगा।
जयदेव भवन में हुआ यह लोकार्पण समारोह साहित्य, सामाजिक चिंतन और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की सहभागिता के साथ संपन्न हुआ। पुस्तक अब पाठकों के बीच पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
नाई भारत | NAI BHARAT
26 सितंबर 2026

