नई दिल्ली: मतदाता सूची में नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 को लेकर राजनीतिक विवाद सोमवार को और तेज हो गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर फॉर्म-6 में कथित तौर पर बिना उचित अधिकार के बदलाव करने का आरोप लगाया।
राहुल गांधी की यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद सामने आई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 में किए गए किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने संबंधित रिकॉर्ड देखने की बात कही, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फॉर्म में बदलाव किस स्तर पर और किसके अधिकार से किया गया।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में बदलाव “गैरकानूनी और एकतरफा” तरीके से किया गया। उन्होंने इसे चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराए जाने की बात कही। हालांकि, ये राहुल गांधी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें अभी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
क्या है फॉर्म-6 का विवाद?
फॉर्म-6 नए पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। चुनाव आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर भी फॉर्म-6 को नए मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित आवेदन के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
विवाद मुख्य रूप से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े अतिरिक्त घोषणा-पत्र और उससे संबंधित प्रक्रिया को लेकर है। इस प्रक्रिया में नए मतदाताओं से पुराने मतदाता रिकॉर्ड तथा उनके माता-पिता या दादा-दादी के नाम से संबंधित जानकारी मांगे जाने को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं।
सितंबर में सामने आए चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेदों से संबंधित रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा फॉर्म में किए गए बदलाव पर आपत्ति जताने की बात सामने आई थी। उनका तर्क था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोप को बताया भ्रामक
राहुल गांधी के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने सोमवार को अपना पक्ष रखते हुए उनके बयान को “भ्रामक” बताया।
आयोग के अनुसार, बिहार में 24 जून 2025 को जारी SIR आदेश को आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी प्राप्त थी और सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में उस आदेश को बरकरार रखा था। आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने स्पष्टीकरण का भी हवाला दिया।
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने यह भी कहा कि मूल फॉर्म-6 में वैसा बदलाव नहीं किया गया जैसा आरोप लगाया जा रहा है। आयोग के अनुसार, SIR के लिए फॉर्म-6 के साथ एक घोषणा जोड़ी गई थी, जबकि SIR के बाहर सामान्य अवधि में संबंधित वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म ही लागू रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से बढ़ी अहमियत
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने विवाद को एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल में बदल दिया है। अदालत यह देखना चाहती है कि फॉर्म-6 में संबंधित परिवर्तन किस प्रक्रिया के तहत किया गया और इसके लिए किस प्राधिकरण की अनुमति थी।
इस पूरे मामले में अब तीन अलग-अलग स्तर दिखाई दे रहे हैं—राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप, चुनाव आयोग का आधिकारिक स्पष्टीकरण और सुप्रीम कोर्ट की ओर से रिकॉर्ड की जांच की बात।
इसलिए फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति तय होने से पहले किसी भी आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
SIR को लेकर विपक्ष और आयोग आमने-सामने
फॉर्म-6 का विवाद ऐसे समय सामने आया है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच पहले से ही तीखी बहस चल रही है।
विपक्षी दल मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया, पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने तथा डुप्लीकेट, मृत या अपात्र प्रविष्टियों को हटाने के लिए पुनरीक्षण आवश्यक है। आयोग और भाजपा ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज किया है कि यह प्रक्रिया किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की जा रही है।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर है। इन्हीं दस्तावेजों से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि फॉर्म-6 से जुड़े विवादित बदलाव की वास्तविक प्रक्रिया क्या थी और उसकी अनुमति किस स्तर पर दी गई थी।
नाई भारत | 5 अक्टूबर 2026

