बॉक्साइट कीमत विवाद में वेदांता को हाईकोर्ट से राहत नहीं, 2004 की व्यवस्था बहाल करने की याचिका खारिज

ओडिशा हाईकोर्ट ने पुराने समझौतों को दोबारा लागू करने की मांग नहीं मानी; मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत कार्रवाई का रास्ता साफ

नाई भारत | भुवनेश्वर | 1 अक्टूबर 2026

ओडिशा में बॉक्साइट की आपूर्ति और कीमत को लेकर लंबे समय से चल रहा वेदांता और ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन (OMC) का विवाद अब एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। ओडिशा हाईकोर्ट ने वेदांता लिमिटेड की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने पुराने समझौते के आधार पर बॉक्साइट की आपूर्ति और मूल्य निर्धारण व्यवस्था को फिर से लागू करने की मांग की थी।

मुख्य न्यायाधीश हरिश टंडन और न्यायमूर्ति मुराहरी श्री रमन की खंडपीठ ने वेदांता की उस मांग को स्वीकार नहीं किया, जिसमें करीब 150 मिलियन टन बॉक्साइट की आपूर्ति पुराने मूल्य निर्धारण फार्मूले के आधार पर जारी रखने की बात कही गई थी।

विवाद की शुरुआत दो दशक पहले

मामले की जड़ 2003-04 के दौरान हुए समझौतों में है। वेदांता की ओर से लांजीगढ़ में एल्युमिना रिफाइनरी स्थापित करने की योजना के दौरान ओएमसी के साथ बॉक्साइट की दीर्घकालिक आपूर्ति से जुड़े प्रावधान सामने आए थे।

अक्टूबर 2004 के समझौते में 150 मिलियन टन बॉक्साइट की आपूर्ति का प्रावधान था। कीमत उत्पादन लागत और रॉयल्टी से जुड़े फार्मूले पर आधारित थी। वेदांता का कहना था कि उसने ओडिशा में बड़े निवेश इन्हीं दीर्घकालिक आश्वासनों को ध्यान में रखते हुए किए थे।

लेकिन बाद में खनन कानून और सरकारी नीतियों में बदलाव के साथ पुरानी व्यवस्था की कानूनी स्थिति बदल गई।

2015 के बाद बदला पूरा ढांचा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि ओएमसी और वेदांता से जुड़े पुराने संयुक्त उपक्रम समझौतों को सितंबर 2015 में समाप्त कर दिया गया था। यह कार्रवाई MMDR कानून में हुए बदलावों के बाद हुई थी।

अदालत ने कहा कि उस समय समाप्ति को चुनौती नहीं दी गई और बाद में वेदांता ने राज्य की नई Long Term Linkage (LTL) व्यवस्था में भाग लिया। कंपनी ने 2018 में नई व्यवस्था के तहत समझौता किया और 2023 में एक और LTL समझौता किया।

अदालत के सामने राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि पुराने समझौतों को समाप्त किए जाने के वर्षों बाद उनके चुनिंदा प्रावधानों को फिर से लागू करने की मांग कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।

प्राकृतिक संसाधनों पर अदालत की अहम टिप्पणी

वेदांता ने promissory estoppel के सिद्धांत का भी सहारा लिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सिद्धांत के जरिए सरकार या उसकी एजेंसियों को मौजूदा कानून के विपरीत कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

पीठ ने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में वैधानिक व्यवस्था के महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि कानून में बदलाव के बाद पुराने आश्वासनों के आधार पर प्राकृतिक संसाधन की आपूर्ति के लिए पुराने व्यावसायिक अधिकार को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

वर्तमान बॉक्साइट आपूर्ति पर तत्काल असर नहीं

अदालत ने याचिका खारिज करने के साथ मामले में जारी अंतरिम आदेशों को भी समाप्त कर दिया और संबंधित पक्षों को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की अनुमति दी।

हालांकि, वेदांता की ओर से कहा गया है कि कंपनी फैसले का अध्ययन कर रही है और उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी। कंपनी के अनुसार, इस आदेश से वेदांता एल्युमिनियम को होने वाली वर्तमान बॉक्साइट आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई है।

इस फैसले का तत्काल प्रभाव पुराने 2004 मूल्य निर्धारण फार्मूले को दोबारा लागू कराने की वेदांता की मांग पर पड़ा है, जबकि आगे की बॉक्साइट आपूर्ति और कीमतें मौजूदा कानूनी एवं नीतिगत ढांचे के अनुसार तय होंगी।