नुआखाई के बहाने संबलपुर की सांस्कृतिक विरासत पर धर्मेंद्र प्रधान का जोर

रंगबती फोरम के विशेष कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री एवं संबलपुर सांसद धर्मेंद्र प्रधान ने नुआखाई की आध्यात्मिक-सामाजिक महत्ता, पारंपरिक व्यंजन ‘सरसतिया’ और क्षेत्र की कला-संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने की आवश्यकता पर दिया जोर

संबलपुर: ओडिशा के संबलपुर में आयोजित ‘रंगबती फोरम’ के विशेष कार्यक्रम में नुआखाई की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के साथ-साथ संबलपुर की कला, साहित्य, लोक परंपरा, हस्तशिल्प और पर्यटन क्षमता पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों और विशिष्ट अतिथियों ने विचारों का आदान-प्रदान किया।

कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री एवं संबलपुर के सांसद धर्मेंद्र प्रधान ने नुआखाई के व्यापक सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने इस पर्व को केवल नई फसल के स्वागत तक सीमित न मानते हुए इसे समाज, परिवार, आस्था और सांस्कृतिक पहचान को जोड़ने वाली परंपरा के रूप में सामने रखा।

नुआखाई केवल त्योहार नहीं, सांस्कृतिक पहचान

नुआखाई ओडिशा के प्रमुख कृषि-आधारित लोकपर्वों में से एक है। नई फसल के आगमन के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व किसानों और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। साथ ही यह परिवारों और समुदायों को एक साथ लाने वाली सामाजिक परंपरा के रूप में भी अपनी पहचान बनाए हुए है।

धर्मेंद्र प्रधान ने नुआखाई की इसी व्यापक भावना को रेखांकित करते हुए इसके आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष पर ध्यान आकर्षित किया। नुआखाई की परंपरा पीढ़ियों को जोड़ने के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक एकता को मजबूत करती है।

‘सरसतिया’ के जरिए स्थानीय स्वाद की पहचान

कार्यक्रम में संबलपुर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का भी उल्लेख हुआ। स्थानीय पारंपरिक व्यंजन ‘सरसतिया’ को क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा गया।

स्थानीय भोजन केवल स्वाद का माध्यम नहीं होता, बल्कि उसके पीछे किसी क्षेत्र का इतिहास, जीवनशैली, कृषि व्यवस्था और सामाजिक परंपराएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे पारंपरिक व्यंजन स्थानीय संस्कृति को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

महानदी के किनारे बसा सांस्कृतिक केंद्र

संबलपुर की पहचान केवल नुआखाई तक सीमित नहीं है। महानदी के तट पर स्थित संबलपुर प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता का अनूठा संगम है।

यह क्षेत्र लोककला, साहित्य, संगीत, पारंपरिक संस्कृति और प्रसिद्ध संबलपुरी हस्तशिल्प के लिए देशभर में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां की लोक परंपराएं और हस्तशिल्प स्थानीय जीवन और ऐतिहासिक विरासत की कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

देब्रीगढ़ से पर्यटन की नई संभावनाएं

संबलपुर की प्राकृतिक संपदा भी क्षेत्र की पहचान को मजबूत करती है। देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र के प्रमुख प्राकृतिक आकर्षणों में शामिल है।

वन्यजीवन, जंगल, प्राकृतिक परिदृश्य और आसपास की सांस्कृतिक विरासत को एक साथ विकसित करने से संबलपुर में इको-टूरिज्म और सांस्कृतिक पर्यटन की बड़ी संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

स्थानीय विरासत को वैश्विक मंच देने की जरूरत

रंगबती फोरम के कार्यक्रम से एक व्यापक संदेश सामने आया कि संबलपुर की विरासत को केवल क्षेत्रीय उत्सवों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। नुआखाई, संबलपुरी हस्तशिल्प, लोककला, साहित्य, संगीत, पारंपरिक भोजन और प्राकृतिक पर्यटन—इन सभी को एक साथ जोड़कर संबलपुर की एक मजबूत सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

इसके लिए स्थानीय कलाकारों, हस्तशिल्पकारों, सांस्कृतिक संस्थाओं, पर्यटन क्षेत्र और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया।

नुआखाई से दुनिया तक संबलपुर की कहानी

नुआखाई के अवसर पर संबलपुर की चर्चा केवल एक पर्व तक सीमित नहीं रहती। यह अवसर क्षेत्र की जीवंत संस्कृति को दुनिया के सामने रखने का माध्यम भी बन सकता है।

संबलपुर की पहचान में कृषि, आस्था, लोककला, हस्तशिल्प, साहित्य, पारंपरिक भोजन, वन्यजीवन और प्राकृतिक सौंदर्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सभी विरासतों को संरक्षित करते हुए आधुनिक माध्यमों और पर्यटन के जरिए वैश्विक मंच तक पहुंचाने की आवश्यकता है।

नुआखाई इसी सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है—एक ऐसा पर्व जो नई फसल के साथ नई उम्मीद, सामाजिक एकता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है।

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