जून से सितंबर के बीच देश में 759.4 मिमी बारिश; पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में कमी अधिक, ओडिशा में सामान्य से ज्यादा वर्षा
भारत का 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून समाप्त हो गया है और इस बार देश को सामान्य से काफी कम बारिश मिली है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की अंतिम रिपोर्ट के अनुसार जून से सितंबर के बीच देश में 759.4 मिमी बारिश हुई, जबकि दीर्घकालिक औसत 868.6 मिमी है।
इस तरह पूरे देश में मौसमी बारिश LPA की 87 प्रतिशत रही। IMD के अनुसार 2026 का मानसून वर्ष 2001 के बाद चौथा सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा।
देशभर में बारिश का असर एक जैसा नहीं
राष्ट्रीय स्तर पर बारिश में कमी दर्ज हुई, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति काफी अलग रही।
उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश LPA की 94 प्रतिशत और मध्य भारत में 97 प्रतिशत रही। दोनों क्षेत्रों में मौसमी बारिश सामान्य श्रेणी के आसपास रही।
इसके विपरीत पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में बारिश केवल 74 प्रतिशत और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 76 प्रतिशत रही।
पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में कुल 1,016.3 मिमी तथा दक्षिण प्रायद्वीपीय क्षेत्र में 542 मिमी बारिश दर्ज की गई।
IMD के मुताबिक पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में इस क्षेत्र के लिए 1901 के बाद सबसे कम मौसमी बारिश दर्ज हुई। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में यह 1901 के बाद चौथी सबसे कम और 2001 के बाद दूसरी सबसे कम मौसमी बारिश रही।
ओडिशा का बारिश रिकॉर्ड अलग
राष्ट्रीय आंकड़ों के बीच ओडिशा का प्रदर्शन अलग रहा।
IMD की अंतिम रिपोर्ट के अनुसार देश की 36 मौसम विज्ञान उप-विभागों में ओडिशा एकमात्र ऐसा उप-विभाग रहा जहां पूरे मानसून सीजन में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हुई।
18 उप-विभागों में सामान्य बारिश रही, जो देश के 53 प्रतिशत क्षेत्र को कवर करते हैं। वहीं 17 उप-विभागों में सामान्य से कम बारिश हुई, जिनका क्षेत्रफल देश के करीब 42 प्रतिशत हिस्से के बराबर है।
इससे स्पष्ट होता है कि देश की कुल बारिश में कमी हर राज्य और हर क्षेत्र में समान नहीं रही।
मानसून में बार-बार बदला बारिश का पैटर्न
2026 में मानसून की सबसे बड़ी विशेषता उसका असमान और उतार-चढ़ाव वाला व्यवहार रहा।
जून में देश को सामान्य बारिश का केवल 65 प्रतिशत मिला। जुलाई में स्थिति सुधरी और बारिश LPA की 101 प्रतिशत तक पहुंच गई।
लेकिन अगस्त में बारिश फिर घटकर 84 प्रतिशत और सितंबर में 92 प्रतिशत रह गई।
साप्ताहिक आंकड़ों में भी बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला। 8 जुलाई को समाप्त सप्ताह में बारिश सामान्य से 45.4 प्रतिशत अधिक रही, लेकिन अगले सप्ताह इसमें 51.1 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।
सितंबर के पहले हिस्से में भी कमी बनी रही। 9 सितंबर को समाप्त सप्ताह तक मौसमी कमी करीब 36.3 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई बारिश ने स्थिति में कुछ सुधार किया।
रबी फसल के लिए पानी और मिट्टी की नमी महत्वपूर्ण
मानसून की बारिश भारत की वर्षा-आधारित खेती के लिए महत्वपूर्ण होती है।
IMD के अनुसार देश के मानसून कोर क्षेत्र में 779.9 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य श्रेणी की न्यूनतम सीमा से भी कम है। इस क्षेत्र में देश के कई वर्षा-आधारित कृषि इलाके शामिल हैं।
अब रबी सीजन की तैयारी के दौरान मिट्टी में नमी, सिंचाई की उपलब्धता और जल संसाधनों की स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
हालांकि अलग-अलग राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है। जहां सिंचाई की बेहतर सुविधा है, वहां कम मानसूनी बारिश का प्रभाव अलग हो सकता है।
जलाशयों पर भी नजर
कम बारिश के कारण देश के जल भंडारों की स्थिति भी चिंता का विषय बनी है।
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 28 सितंबर तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत पानी था। यह स्तर पिछले दस वर्षों के औसत और पिछले वर्ष की समान अवधि से नीचे था। दक्षिण भारत में जलाशयों की स्थिति विशेष रूप से कमजोर रही।
ऐसे में आने वाले महीनों में जल प्रबंधन और उपलब्ध पानी के विवेकपूर्ण उपयोग पर ध्यान बढ़ सकता है।
El Niño का प्रभाव
2026 के मानसून के दौरान El Niño भी एक महत्वपूर्ण जलवायु कारक रहा।
IMD की रिपोर्ट बताती है कि पूरे सीजन में बारिश लगातार एक जैसी नहीं रही, बल्कि कई बार सूखा और बारिश वाला दौर एक-दूसरे के बाद आते रहे।
इस मानसून सीजन में कुल 77 कम दबाव प्रणाली वाले दिन दर्ज हुए, जबकि सामान्य आंकड़ा 57 दिन का है।
अब दक्षिण भारत के लिए उत्तर-पूर्वी मानसून की गतिविधियां महत्वपूर्ण होंगी।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
कम बारिश का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। कृषि उत्पादन और किसानों की आय में बदलाव होने पर ग्रामीण बाजार में मांग भी प्रभावित हो सकती है।
Reuters ने 1 अक्टूबर की रिपोर्ट में बताया कि कमजोर मानसून के बीच सितंबर में ट्रैक्टर और कुछ अन्य ग्रामीण मांग से जुड़े वाहन खंडों में बिक्री में कमी दर्ज हुई।
हालांकि इसका असर सभी क्षेत्रों में समान नहीं होगा। शहरी मांग, सरकारी सहायता, सिंचाई सुविधाएं और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार कुछ प्रभावों को सीमित कर सकते हैं।
अब आगे क्या?
दक्षिण-पश्चिम मानसून के समाप्त होने के बाद देश की नजर अब पोस्ट-मानसून गतिविधियों पर है।
विशेष रूप से दक्षिण भारत के लिए उत्तर-पूर्वी मानसून महत्वपूर्ण रहेगा। वहीं रबी फसल, जलाशयों की स्थिति, भूजल और खाद्य कीमतों पर भी निगरानी बनी रहेगी।
2026 का मानसून इसलिए केवल कम बारिश का आंकड़ा नहीं है। इसके साथ क्षेत्रीय असमानता, जल उपलब्धता, कृषि योजना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
आने वाले महीनों में उपलब्ध जल संसाधनों का प्रबंधन और रबी सीजन की तैयारी इस मानसून के बाद सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहेंगे।
नाई भारत | नई दिल्ली
1 अक्टूबर 2026

